एन ए आई ब्यूरो।

शिमला, रोल-मॉडल बन कर अपने मासूम बेटे शाश्वत  के सभी अंग दान करने वाले इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्रोफेसर डॉ. पुनीत महाजन ने  उमंग फाउंडेशन के वेबिनार में अंगदान की बारीकियां समझाईं। कहा कि देश में हर साल चार लाख मरीज अंग प्रत्यारोपण के इन्तज़ार में मर जाते हैं। जबकि एक ‘ब्रेन डेड’ डोनर सारे अंग दान करके सीधे तौर पर 8 जानें बचा सकता है और दो दृष्टिहीन लोगों को रोशनी दे सकता है। जीवन काल में भी कुछ अंग दान किए जा सकते हैं।

कार्यक्रम के संयोजक एवं उमंग फाउंडेशन के ट्रस्टी डॉ सुरेंद्र कुमार के अनुसार डॉ. पुनीत महाजन उमंग फाउंडेशन द्वारा आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष में मानवाधिकार जागरूकता अभियान के अंतर्गत 18वें साप्ताहिक वेबिनार में “मरीजों का जीवन बचाने हेतु अंगदान का अधिकार” विषय पर उत्तर भारत के 8 राज्यों के युवाओं को सम्बोधित कर रहे थे। फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. अजय श्रीवास्तव ने बताया कि कार्यक्रम में 150 से अधिक युवाओं ने वर्चुअल माध्यम से हिस्सा लिया।  उन्होंने कहा की उमंग फाउंडेशन भविष्य में अंगदान को लेकर जागरूकता मुहिम जारी रखेगा।

डॉ. पुनीत महाजन और उनकी पत्नी डॉ. शिवानी महाजन ने 5 वर्ष पूर्व अपने 13 वर्षीय बेटे शाश्वत के पीजीआई में ब्रेन डेड घोषित होने के बाद सभी अंग दान कर कई लोगों की जिंदगी बचाई थी। डॉ. पुनीत को हिमाचल प्रदेश सरकार ने स्टेट ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांटेशन ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) का नोडल अधिकारी भी बनाया है। कार्यक्रम में स्वर्गीय शाश्वत को श्रद्धांजलि भी दी गई महाजन परिवार का आभार जताया गया।

उन्होंने बताया कि हम जीवन काल में भी एक किडनी, बोनमैरो का हिस्सा और पैंक्रियास एवं लीवर का अंश दान कर बेबस मरीजों का जीवन बचा सकते हैं। जबकि ब्रेन डेड होने के बाद दिल, किडनी, लिवर, पैनक्रियास, फेफड़े, त्वचा, हड्डी, आंतें, आंख की पुतली एवं टिशू आदि दान की जा सकती है।

उनका कहना था कि ब्रेन डेड वह अवस्था होती है जब मस्तिष्क पूरी तरह मृत हो जाता है और उसके पुनर्जीवन की गुंजाइश खत्म हो जाती है। लेकिन उस मरीज को वेंटिलेटर से लगातार ऑक्सिजन दी जाती है ताकि उसके शरीर में खून का संचरण बना रहे। घर में या अस्पताल में किसी की मृत्यु होने पर तब तक अंगदान नहीं हो सकता जब तक कि वह वेंटिलेटर पर न हो। किसी मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने के लिए अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक कमेटी होती है।

अंगदान के लिए कोई भी व्यक्ति संकल्प पत्र भरकर अस्पताल में जमा कर सकता है। मृत्यु के बाद परिजनों की सहमति के बाद ही अंगदान हो सकता है। यदि परिजन किसी मृतक का शरीर दान करते हैं तो उसका उपयोग मेडिकल कॉलेज में रिसर्च और टीचिंग के लिए ही होता है। उस शरीर के अंग उपयोग नहीं किए जा सकते हैं।

डॉ पुनीत महाजन ने बताया कि हर अंग को ब्रेन डेड घोषित शरीर से निकालने के बाद एक निश्चित समय में दूसरे मरीज को प्रत्यारोपित करना पड़ता है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर और क्षेत्रीय स्तर पर ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन समन्वय करते हैं। अंग को यथा शीघ्र एक स्थान से दूसरे स्थान तक विमान से भेजने और समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए सड़क पर सारा ट्रैफिक रोक कर ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाता है।

उन्होंने कहा कि भारत में विकसित देशों की तुलना में अंगदान का प्रतिशत नगण्य  है। देश में कुल मृतकों में से 2 प्रतिशत से भी कम अंगदान के पात्र होते हैं। यहां हर दस लाख आबादी पर अंगदान का प्रतिशत 0.08 है। उमंग फाउंडेशन जैसी प्रतिबद्ध स्वयंसेवी संस्थाएं अंगदान के प्रति जागरूकता पैदा करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने कहा कि आईजीएमसी शिमला में अभी तक मरीजों को 4 किडनी प्रत्यारोपित हुई हैं। अन्य अंगों के प्रत्यारोपण की सुविधा भविष्य में शुरू की जाएगी।

कार्यक्रम के संचालन में दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरेन्दर कुमार के अलावा विनोद योगाचार्य, संजीव कुमार शर्मा, आकांक्षा जसवाल, दीक्षा वशिष्ठ और उदय वर्मा सहयोगी रहे।

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