एन ए आई ब्यूरो।

शिमला, हिमाचल प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों की दृष्टिबाधित बेटियों के सपनों में उमंग फाउंडेशन रंग भर रहा है। वे अंधेरों से अपनी लड़ाई में उमंग की मेरिट छात्रवृत्ति, शिक्षा और कम्प्यूटर को हथियार बना कर उजाले की ओर कदम बढ़ाने लगी हैं।

उमंग फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “दृष्टिबाधित बेटियों के सशक्तिकरण की हल्की सी आहट से समाज की इस नकारात्मक सोच में बदलाव आ रहा है कि है कि ये ‘बेचारी अन्धी लड़कियां’ कुछ नहीं कर सकतीं।”

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की एमए की छात्राएं अंजना कुमारी हों या चंद्रमणि, या फिर आरकेएमवी कॉलेज की शालिनी, कौशल्या, किरण, प्रिया, अन्जली या मोनिका अथवा अन्य महाविद्यालयों में पढ़ने वाली अन्य दृष्टिबाधित बेटियां, उमंग की मेरिट छात्रवृत्ति योजना और लैपटॉप जैसे सहायक उपकरण उनके जीवन में सार्थक बदलाव ला रहे हैं।

उमंग फाउंडेशन की ब्रांड एंबेसडर, अमेरिका तक में अपने सुरों का जादू बिखेर चुकी, भारतीय चुनाव आयोग की यूथ आइकन और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की पहली दृष्टिबाधित पीएचडी छात्रा मुस्कान नेगी दिव्यांग बेटियों के लिए रोल मॉडल है। वह एक रक्तदाता भी है। उमंग की मेरिट छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाली निशा ठाकुर हिमाचल की पहली दृष्टिबाधित महिला रक्तदाता है।

मुस्कान कहती है, “पूरी तरह दृष्टिबाधित होने के कारण मेरे लिए कंप्यूटर ही पढ़ाई का सहारा है। उमंग फाउंडेशन का पूरा जोर दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को कंप्यूटर से जोड़ने पर है। मुझे एवं अन्य विद्यार्थियों को फाउंडेशन ने 6 वर्ष पूर्व दिल्ली भेज कर कंप्यूटर का प्रशिक्षण दिलवाया था।”

लैपटाप, मोबाइल, यूट्यूब, व्हाट्सएप, और इंस्टाग्राम आदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म दृष्टिबाधित बेटियों के लिए नेटवर्किंग के साथ ही पढ़ाई का जरिया भी हैं। वह टॉकिंग सॉफ्टवेयर के माध्यम से सुनकर पढ़ लेती हैं।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के  सुगम्य पुस्तकालय में टॉकिंग सॉफ्टवेयर वाले कंप्यूटरों से पढ़ाई करती दृष्टिबाधित पीएचडी स्कॉलर – प्रतिभा चौहान, मुस्कान नेगी, इतिका चौहान यूजीसी नेट और सेट  पास कर चुकी हैं। एमए कर रही प्रतिभाशाली छात्राएं- शगुन चौहान, चन्द्रमणी, अंजना कुमारी कम्प्यूटर से आँखों का काम लेती हैं।

इतिहास विषय में एमए कर रही अंजना कुमारी कहती है, “प्रो. अजय श्रीवास्तव ने मुझे पिता और माँ, दोनों की कमी महसूस नहीं होने दी। हम दृष्टिबाधित छात्राएं उनमें पिता की छवि देखती हैं।”

प्रो. अजय श्रीवास्तव ने कहा, “ग्रामीण क्षेत्रों की बेटियां यदि दिव्यांग हों तो उनकी मुश्किलें दूसरों से ज्यादा होती हैं। यदि वे दृष्टिबाधित हों और घर में गरीबी भी हो तो उनका जीवन नर्क बन जाता है। इसीलिए हम उनकी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं ताकि वे आत्मनिर्भर सकें।”

गौरतलब है कि शिमला के पोर्टमोर स्कूल में दृष्टिबाधित बेटियों की पढ़ाई के अधिकार के लिए लिए प्रो. अजय श्रीवास्तव ने वर्ष 2011 में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। उस पर फैसले से हिमाचल दिव्यांग बच्चों को पहली कक्षा से लेकर विश्वविद्यालय में पीएचडी तक की पढ़ाई  निशुल्क उपलब्ध कराने और सबसे ज्यादा छात्रवृत्ति देने वाला देश का पहला राज्य बन गया। उनके प्रयासों से दृष्टिबाधित बेटियों को सुंदरनगर स्थित आईटीआई के कंप्यूटर डिप्लोमा कोर्स में 2016 से प्रवेश मिलना शुरू हुआ था।

उमंग फाउंडेशन ने अनेक दृष्टिबाधित बेटियों को पढ़ाई के लिए लैपटॉप, डेज़ी प्लेयर और एंजेल प्लेयर जैसे उपकरण भी दिए। दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को परीक्षा लिखने के लिए उमंग से जुड़े विद्यार्थी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर तक राइटर की भूमिका निभाते हैं।
दिव्यांगों की शिक्षा के अधिकार के लिए प्रो. अजय श्रीवास्तव के संघर्ष का सबसे ज्यादा लाभ दृष्टिबाधित बेटियों को मिला। संगीता, इंदू कुमारी, भावना ठाकुर, अनीशा कुमारी, बिल्लो, पूनम, कुसुम, मोनिका, शिल्पा चंदेल, कमलेश शर्मा, नन्दकला, देवन्ती, वीना, आशा, विद्या, सूमादेवी आदि, उस लंबी सूची का हिस्सा हैं जिन्होंने आंखों में रोशनी के अभाव को अपनी कमजोरी नहीं, मजबूती बनाया। उमंग फाउंडेशन ने ऐसी सैकड़ों बेटियों के हौसलों को पंख दिए हैं।

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